International Journal of Contemporary Research In Multidisciplinary, 2026;5(3):1287-1290
कुलजम स्वरूप का दार्शनिक अनुशीलन
Author Name: आदित्य सिंह यादव;
Paper Type: research paper
Article Information
Abstract:
महामति श्री प्राणनाथ जी (१६१८-१६९४ ई.) की श्री मुखवाणी - श्री तारतम सागर (श्री कुलजम सरूप) के सत्रह ग्रन्थों के अवतरण का हेतु, मानव चेतना रूपी परिधि पर विभिन्न भाषा, संस्कार भेदों तथा सांस्कृतिक पृष्ठ भूमियों के अनेक बिन्दुओं पर स्थित मानव आत्माओं को उनके अन्तिम गन्तव्य-केन्द्र- बिन्दु जागनी अथवा पूर्णब्रह्म परमात्मा के अनन्त स्वलीलाद्वैत की साक्षात् अनुभूति-भूमि परमधाम तक का सेतु निर्माण है, जिसके सातवें ग्रन्थ सनंध का बाह्य प्रयोजन बादशाह औरंगजेब की धर्म संबंधी कट्टर एवं संकीर्ण समझ की अंधेरी दीवालों को कुरान शरीफ के सही एवं गुह्य मायनों के पवित्र प्रकाश द्वारा मिटाकर, उस संकीर्ण स्वभाव के सभी लोगों को, आत्म-साक्षात्कार की जागनी-उपलब्धि तक पहुँचा देना है।
120 प्रणामी सम्प्रदाय और जागनी दर्शन
"सागर" ग्रन्थ में कहा गया है
आया इलम लुंदनी एक है, केहे साहेदी एक खुदाए ।। 20
अरस देख्या रूह अल्ला, हक सूरत किसोर सुन्दर ।। 2l
सर्वश्रेष्ठ परब्रह्म परमात्मा एक है- कहे खुदा एक मंहमद बरहक।। 22
कुरान में भी एक परमात्मा की साक्षी दी गई है- 'सबका खाविंद एक' ।।
वेद भी एक ही ब्रह्म की घोषणा करते हैं :
Keywords:
कुलजम स्वरूप, तारतम सागर, तारतम वाणी
How to Cite this Article:
आदित्य सिंह यादव. कुलजम स्वरूप का दार्शनिक अनुशीलन. International Journal of Contemporary Research in Multidisciplinary. 2026: 5(3):1287-1290
Download PDF