International Journal of Contemporary Research In Multidisciplinary, 2026;5(3):1151-1157
शुष्क एवं अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में गिरते भूजल स्तर का कृषि प्रतिरूप और आजीविका पर प्रभाव: एक स्थानिक विश्लेषण
Author Name: डॉ. पदमा गुप्ता;
Abstract
प्रस्तुत शोध पत्र भारत के शुष्क एवं अर्ध-शुष्क भौगोलिक क्षेत्रों में तीव्र गति से गिरते भूजल स्तर के परिणामस्वरूप शस्य प्रतिरूप (फसल प्रारूप), कृषि उत्पादकता, पारिस्थितिकीय संतुलन तथा ग्रामीण आजीविका पर पड़ने वाले बहुआयामी प्रभावों का एक समग्र स्थानिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। पिछले तीन से चार दशकों में हरित क्रांति की तकनीकों, अनियंत्रित नलकूप उत्खनन, अत्यधिक ऊर्जा अनुदान तथा जल-सघन नकदी फसलों के अविवेकपूर्ण चयन ने इन पारिभाषिक रूप से जल-अल्पता वाले क्षेत्रों में भूजल संसाधनों का संकटपूर्ण दोहन किया है।
प्रस्तुत अध्ययन प्राथमिक क्षेत्रीय अवलोकनों, उपग्रह आधारित स्थानिक आंकड़ों तथा द्वितीयक जल-भूवैज्ञानिक प्रतिवेदनों के समन्वय पर आधारित है। विश्लेषण यह प्रमाणित करता है कि जल-स्तर के अत्यधिक नीचे जाने से उच्च जल मांग वाली फसलों (जैसे गेहूं, धान, कपास और गन्ना) के रकबे में संरचनात्मक ह्रास हुआ है तथा किसानों को विवश होकर निम्न उत्पादकता वाली, शुष्क जलवायु प्रतिरोधी फसलों (जैसे बाजरा, ज्वार, दलहन और तिलहन) की ओर पुनः लौटना पड़ रहा है।
इसके अतिरिक्त, सिंचाई की बढ़ती लागत, नलकूपों के विफल होने तथा भूमि क्षारीयता में वृद्धि ने छोटे और सीमांत कृषकों को ऋणग्रस्तता, भूमिहीनता और अनैच्छिक मौसमी प्रवासन के दुष्चक्र में धकेल दिया है। अध्ययन के निष्कर्ष स्पष्ट करते हैं कि वर्तमान संकट केवल संसाधन-अल्पता का नहीं, बल्कि दोषपूर्ण नीतिगत प्राथमिकताओं और अनियंत्रित दोहन का परिणाम है। अंततः, शोध पत्र में सूक्ष्म-सिंचाई प्रणालियों, सहभागी भूजल प्रबंधन, परंपरागत जल संचयन संरचनाओं के पुनरुद्धार तथा फसल विविधीकरण आधारित एक व्यापक, टिकाऊ एवं समेकित नीतिगत रूपरेखा प्रस्तावित की गई है।
Keywords
शुष्क एवं अर्ध-शुष्क क्षेत्र, भूजल अवक्षय, शस्य प्रतिरूप, ग्रामीण आजीविका, स्थानिक विश्लेषण, सहभागी जल प्रबंधन, सूक्ष्म-सिंचाई।