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International Journal of Contemporary Research in Multidisciplinary
ISSN: 2583-7397
Open Access • Peer Reviewed
Impact Factor: 5.67

International Journal of Contemporary Research In Multidisciplinary, 2026;5(2):248-256

21वीं सदी के हिंदी उपन्यासों में ग्रामीण युवाओं की आकांक्षाएँ और विस्थापन (2011–2020)

Author Name: Lumbha Ram;   Dr. Rahmat Ali Saiyad;  

1. Research Scholar, Department of Hindi, Faculty of Arts & Humanities, Gujarat University, Ahmedabad, Gujarat, India

2. Associate Professor, Department of Hindi, Faculty of Arts & Humanities, From: Gujarat University, Ahmedabad, Gujarat, India

Abstract

इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में हिंदी उपन्यासों में ग्रामीण जीवन के चित्रण में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन परिलक्षित होता है, जिसमें ग्रामीण युवाओं की आकांक्षाएँ, पहचान-संकट, तथा विस्थापन की प्रक्रियाएँ प्रमुख विमर्श के रूप में उभरती हैं। प्रस्तुत अध्ययन का उद्देश्य 2011 से 2020 के बीच प्रकाशित हिंदी उपन्यासों के माध्यम से ग्रामीण युवाओं की बदलती आकांक्षाओं और उनके सामाजिक-आर्थिक विस्थापन की प्रवृत्तियों का विश्लेषण करना है। इस कालखंड में वैश्वीकरण, बाज़ारवाद, तकनीकी विकास तथा शहरीकरण के प्रभाव ने ग्रामीण युवाओं की मानसिक संरचना, जीवन-लक्ष्य और सांस्कृतिक संबंधों को गहराई से प्रभावित किया है।

अध्ययन में चयनित उपन्यासों के तुलनात्मक और विषयवस्तु-आधारित विश्लेषण के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि ग्रामीण युवा अब पारंपरिक कृषि-आधारित जीवन से विमुख होकर शिक्षा, रोजगार, उपभोक्तावादी जीवनशैली तथा सामाजिक गतिशीलता की ओर अग्रसर हैं। इस प्रक्रिया में विस्थापन केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक और अस्तित्वगत भी है। उपन्यासों में यह प्रवृत्ति बहुआयामी संकट के रूप में प्रस्तुत होती है, जिसमें युवा वर्ग परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन स्थापित करने में संघर्षरत दिखाई देता है।

अध्ययन के निष्कर्ष यह संकेत देते हैं कि हिंदी उपन्यासों में ग्रामीण युवाओं का विस्थापन केवल आर्थिक बाध्यता नहीं, बल्कि आकांक्षाओं की अनिवार्यता से उत्पन्न एक जटिल प्रक्रिया है, जो सामाजिक संरचना, पारिवारिक संबंधों और सांस्कृतिक पहचान को पुनर्परिभाषित करती है।

Keywords

ग्रामीण युवा, आकांक्षा, विस्थापन, हिंदी उपन्यास, वैश्वीकरण, शहरीकरण, सांस्कृतिक संकट, पहचान