International Journal of Contemporary Research In Multidisciplinary, 2026;5(1):326-328
आधुनिक समय में जातिवाद का आलोचनात्मक अध्ययन
Author Name: किरण वर्मा;
Abstract
यह पेपर आधुनिक समय में जातिवाद की आलोचनात्मक जांच करता है, जिसमें वैदिक काल की कर्म-आधारित वर्ण व्यवस्था (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) से लेकर कठोर जन्म-आधारित पदानुक्रम तक के विकास पर प्रकाश डाला गया है, जो सामाजिक विभाजन और असमानता को बढ़ावा देता है। लेखक तर्क देते हैं कि जातिवाद सामाजिक सद्भाव को कमजोर करता है, शत्रुता को बढ़ावा देता है और राष्ट्रीय प्रगति में बाधा डालता है, जो प्राचीन समानता और मानव एकता के आदर्शों के विपरीत है। ऐतिहासिक व्यक्तित्वों जैसे भगवान बुद्ध, जो समानता के पक्षधर थे, और सुधारकों जैसे डॉ. बी.आर. अंबेडकर तथा ज्योतिबा फुले का हवाला देते हुए, अध्ययन आत्म-जागरूकता, शिक्षा और समावेशी सोच के माध्यम से जाति-आधारित भेदभाव को समाप्त करने की अपील करता है। यह जोर देता है कि सच्ची आधुनिकता जातिगत पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर स्थायी शांति और सामाजिक विकास प्राप्त करने की आवश्यकता है, तथा भारत को वैश्विक नेता के रूप में बहाल करने के लिए निरंतर प्रयासों का आह्वान करता है। संदर्भों में दलित चेतना, अंबेडकर और सामाजिक क्रांतिकारियों पर कार्य शामिल हैं।
Keywords
जातिवाद, आधुनिक समाज, वैदिक परंपरा, वर्ण व्यवस्था, जन्म आधारित जाति, सामाजिक समानता, भगवान बुद्ध के विचार ,अंबेडकर ज्योतिबा फुले, समाज सुधार