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International Journal of Contemporary Research in Multidisciplinary
ISSN: 2583-7397
Open Access • Peer Reviewed
Impact Factor: 5.67

International Journal of Contemporary Research In Multidisciplinary, 2026;5(1):202-210

भक्ति साहित्य में जसनाथ सम्प्रदाय की साधना-पद्धति और चेतनागत दृष्टि एक अनुशीलन

Author Name: Mahesh Choudhary;   Dr. Geljibhai Bhatiya;  

1. Research scholar, Department of Hindi, Faculty of Language and Literature, Gujarat Vidyapith, Ahmedabad, India

2. Associate Professor, Department of Hindi, Faculty of Language and Literature, Gujarat Vidyapith, Ahmedabad, India

Abstract

भक्ति साहित्य भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का वह सशक्त वैचारिक आधार है, जिसमें साधना, लोकचेतना, सामाजिक नैतिकता और आध्यात्मिक अनुशासन का समन्वित रूप दिखाई देता है। इस व्यापक भक्ति परंपरा में जसनाथ सम्प्रदाय एक विशिष्ट स्थान रखता है, जो न केवल अपनी साधना-पद्धति के कारण बल्कि अपनी चेतनागत दृष्टि के कारण भी महत्वपूर्ण है। यह सम्प्रदाय कर्मकांडात्मक रूढ़ियों के स्थान पर आंतरिक शुद्धि, नैतिक संयम और सामाजिक उत्तरदायित्व को साधना का केंद्र बनाता है। प्रस्तुत शोधपत्र का उद्देश्य भक्ति साहित्य के संदर्भ में जसनाथ सम्प्रदाय की साधना-पद्धति तथा चेतना-संरचना का समालोचनात्मक अध्ययन करना है। अध्ययन में यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि किस प्रकार जसनाथ सम्प्रदाय की साधना भक्ति साहित्य की मूल चेतना से जुड़ते हुए एक वैकल्पिक सामाजिक-आध्यात्मिक दृष्टि प्रस्तुत करती है। भारतीय भक्ति आंदोलन केवल धार्मिक अनुभूति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने सामाजिक संरचनाओं, नैतिक मूल्यों और सांस्कृतिक चेतना को भी गहराई से प्रभावित किया। मध्यकालीन भक्ति साहित्य में विभिन्न सम्प्रदायों और संत परंपराओं ने अपने-अपने ढंग से साधना और चेतना का प्रतिपादन किया (शाह et al.,2014)। जसनाथ सम्प्रदाय इसी परंपरा की एक विशिष्ट धारा है, जिसका उद्भव मरुस्थलीय सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों में हुआ। इस सम्प्रदाय की साधना-पद्धति बाह्य आडंबरों से मुक्त होकर जीवन की पवित्रता, पर्यावरणीय संतुलन और सामाजिक समरसता पर आधारित है। भक्ति साहित्य में इसकी उपस्थिति यह दर्शाती है कि भक्ति केवल व्यक्तिगत मुक्ति का साधन नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना के निर्माण का माध्यम भी है।

Keywords

आध्यात्मिकता, योगिक साधनाएँ, हिंदू दर्शन, साधना, आत्म-परिवर्तन