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IJCRM
International Journal of Contemporary Research in Multidisciplinary
ISSN: 2583-7397
Open Access • Peer Reviewed
Impact Factor: 5.67

International Journal of Contemporary Research In Multidisciplinary, 2025;4(5):642-645

जलवायु परिवर्तन के कारण पोषण और खाद्य सुरक्षा पर भौगोलिक प्रभाव

Author Name: स्मृति यादव;   डॉ. अखिलेश यादव;  

1. शोधार्थी, वाई.बी.एन यूनिवर्सिटी, रांची, झारखंड, भारत

2. शोध निर्देशक, सहायक प्राध्यापक, वाई.बी.एन यूनिवर्सिटी, रांची, झारखंड, भारत

Abstract

जलवायु परिवर्तन के कारण पोषण और खाद्य सुरक्षा पर भौगोलिक प्रभाव” विषय पर आधारित यह अध्ययन वर्तमान वैश्विक संकट की एक महत्वपूर्ण समस्या को उजागर करता है। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में वृद्धि, वर्षा के पैटर्न में अस्थिरता, सूखा, बाढ़ और चरम मौसमी घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति ने कृषि उत्पादन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव खाद्य उपलब्धता, पहुँच और गुणवत्ता पर पड़ता है, जिससे पोषण स्तर में गिरावट देखने को मिलती है।

इस शोध में यह विश्लेषण किया गया है कि विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है। उष्णकटिबंधीय और विकासशील देशों में कृषि मुख्य रूप से वर्षा पर निर्भर होने के कारण जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अधिक गहरा है। इन क्षेत्रों में फसल उत्पादन में कमी, मिट्टी की उर्वरता में गिरावट और जल संसाधनों की कमी के कारण खाद्य असुरक्षा की समस्या बढ़ती जा रही है। इसके परिणामस्वरूप कुपोषण, विशेषकर बच्चों और महिलाओं में, एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या के रूप में उभर रहा है।इसके अतिरिक्त, यह अध्ययन दर्शाता है कि जलवायु परिवर्तन केवल खाद्य मात्रा को ही नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता को भी प्रभावित करता है। उच्च तापमान और CO₂ स्तर में वृद्धि से फसलों के पोषक तत्वों जैसे प्रोटीन, आयरन और जिंक की मात्रा में कमी देखी गई है। यह स्थिति वैश्विक पोषण संकट को और अधिक जटिल बनाती है।

अंततः, यह शोध इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा और पोषण के बीच गहरा संबंध है, और भौगोलिक विषमताएँ इस समस्या को और अधिक गंभीर बनाती हैं। इसलिए, सतत कृषि, जल प्रबंधन और प्रभावी नीतियों के माध्यम से इस चुनौती का समाधान अत्यंत आवश्यक है।

Keywords

बीज शब्द-जलवायु परिवर्तन खाद्य सुरक्षा पोषण भौगोलिक प्रभाव कृषि उत्पादन कुपोषण जल संकट सतत विकास फसल गुणवत्ता वर्षा अस्थिरता ग्रामीण जीवन आर्थिक असमानता प्राकृतिक आपदा खाद्य उपलब्धता स्वास्थ्य जोखिम